WGC Report: विश्व भर के केंद्रीय बैंकों ने जून 2026 में सोने की खरीदारी तेज रखते हुए इस वर्ष का सबसे बड़ा मासिक गोल्ड रिजर्व जोड़ा। वर्ल्ड गोल्ड कॉउन्सिल (World Gold Council – WGC) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून में केंद्रीय बैंकों ने कुल 51 टन सोना खरीदा, जो 2026 का अब तक का सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा है। लगातार तीसरे महीने केंद्रीय बैंक शुद्ध खरीदार (Net Buyers) बने रहे, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर सोने को अब भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति माना जा रहा है।
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WGC की सीनियर रिसर्च लीड (APAC) मारिसा सलीम के अनुसार, जून में पोलैंड और चीन ने सबसे अधिक सोना खरीदा। इनके अलावा उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, जॉर्डन, चेक गणराज्य, घाना और जॉर्जिया ने भी अपने स्वर्ण भंडार में बढ़ोतरी की। वहीं रूस और तुर्किये इस दौरान शुद्ध विक्रेता (Net Sellers) रहे।
जून में किस देश ने खरीदा सबसे ज्यादा सोना?
जून 2026 में नेशनल बैंक ऑफ पोलैंड सबसे बड़ा खरीदार रहा। उसने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में 19 टन सोना जोड़ा। इसके बाद पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने 15 टन सोने की खरीद की। खास बात यह रही कि चीन ने लगातार 20वें महीने अपने स्वर्ण भंडार में बढ़ोतरी की।
अन्य प्रमुख खरीदारी इस प्रकार रही:
- पोलैंड – 19 टन
- चीन – 15 टन
- उज्बेकिस्तान – 9 टन
- कजाखस्तान – 7 टन
- जॉर्डन – 3 टन
- चेक गणराज्य – 2 टन
- तुर्किये – 2 टन (साथ ही समान मात्रा बेची भी)
- घाना – 1 टन
- जॉर्जिया – 1 टन
2026 की पहली छमाही में कौन रहा सबसे बड़ा खरीदार?
जनवरी से जून 2026 के दौरान केंद्रीय बैंकों ने कुल 102 टन सोने की खरीद की।
सबसे ज्यादा खरीदारी करने वाले देशों में शामिल हैं:
- पोलैंड – 82 टन
- उज्बेकिस्तान – 41 टन
- चीन – 40 टन
- कजाखस्तान – 27 टन
- चेक गणराज्य – 11 टन
- सिंगापुर – 10 टन
- चिली – 8 टन
- जॉर्डन – 6 टन
- घाना – 6 टन
यह दर्शाता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं (Emerging Markets) के केंद्रीय बैंक लगातार अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
रूस और तुर्किये ने सोना क्यों बेचा?
जहां अधिकांश केंद्रीय बैंक सोना खरीद रहे हैं, वहीं रूस और तुर्किये ने वर्ष की पहली छमाही में अपने गोल्ड रिजर्व का एक हिस्सा बेचा।
रूस ने 44 टन सोना बेचा। इसकी बड़ी वजह यूक्रेन युद्ध के चलते बढ़ता रक्षा खर्च, पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंध और विदेशी संपत्तियों पर लगी रोक रही। बजट घाटे को पूरा करने के लिए रूस को अपने आधिकारिक स्वर्ण भंडार का उपयोग करना पड़ा।
वहीं तुर्किये ने वर्ष की पहली छमाही में 83 टन सोना बेचा। इसका उद्देश्य अपनी मुद्रा लीरा को स्थिर रखना और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना था। हालांकि दूसरी तिमाही में उसकी बिक्री काफी कम होकर केवल 4 टन रह गई।
सोने की कीमतों पर क्या पड़ा असर?
WGC का मानना है कि 2024 से लगातार केंद्रीय बैंकों की खरीदारी सोने की लंबी अवधि की तेजी की सबसे बड़ी वजहों में से एक रही है। हालांकि हाल के महीनों में अमेरिका-ईरान तनाव, महंगाई की चिंताएं, बढ़ती बॉन्ड यील्ड और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित ब्याज दर नीति ने बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ाया। इसके बावजूद सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के रूप में सोने की मांग बनी हुई है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बनी रहती हैं, तो केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की खरीद आने वाले महीनों में भी मजबूत रह सकती है।
सोने, चांदी के भाव से जुड़े सवाल-जवाब, FAQ’s
1. जून 2026 में केंद्रीय बैंकों ने कुल कितना सोना खरीदा?
WGC के अनुसार, जून 2026 में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने कुल 51 टन सोना खरीदा, जो इस वर्ष का सबसे बड़ा मासिक गोल्ड खरीद आंकड़ा है।
2. जून 2026 में सबसे ज्यादा सोना किस देश ने खरीदा?
पोलैंड जून 2026 में सबसे बड़ा खरीदार रहा। इसके केंद्रीय बैंक ने 19 टन सोना खरीदा। इसके बाद चीन ने 15 टन सोना जोड़कर अपनी लगातार खरीदारी का सिलसिला जारी रखा।
3. रूस और तुर्किये ने अपने गोल्ड रिजर्व क्यों घटाए?
रूस ने बढ़ते रक्षा खर्च और बजट घाटे की भरपाई के लिए सोना बेचा, जबकि तुर्किये ने अपनी मुद्रा लीरा को स्थिर रखने और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए गोल्ड रिजर्व का उपयोग किया।
4. केंद्रीय बैंक लगातार सोना क्यों खरीद रहे हैं?
केंद्रीय बैंक वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के उद्देश्य से सोने को एक रणनीतिक और सुरक्षित संपत्ति के रूप में अपने रिजर्व में शामिल कर रहे हैं।
5. क्या केंद्रीय बैंकों की खरीदारी से सोने की कीमतों को समर्थन मिलता है?
हाँ। बड़े पैमाने पर केंद्रीय बैंकों की खरीद वैश्विक बाजार में सोने की मांग को मजबूत करती है। इससे लंबी अवधि में कीमतों को समर्थन मिल सकता है, हालांकि अल्पकाल में ब्याज दरों, डॉलर और अन्य आर्थिक कारकों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है।
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